बुधवार, 24 जुलाई 2013


कहानी 
लूजर 
*दिलीप तेतरवे
यह सब अचानक हो गया. धुआं उठा. आग की लपटें उठीं और सब कुछ राख में परिणत हो गया. काठ की नाव, आग के दरिया में विलीन हो गयी...और विलीन हो गया सोमनाथ समर्थ का शरीर. सोमनाथ समर्थ, जिस ने अपने जीवन में अनेकानेक कहानियां लिखीं, काग़ज पर कम और देह पर ज्यादा...विलीन हो गया एक शक्तिशाली आकर्षक व्यक्तित्त्व...एक मछली का जाल...और वह आज जल गया, जिसकी जिन्दगी से जलने वालों और उस पर मर मिटने वालों की एक लम्बी सूची है...वह पूरी जिन्दगी सामाजिक परम्पराओं से बेपरवाह चला...वह जब तक जीवित रहा, लोग उसे देखते ही कह उठते- समरथ को नहि दोष गोसाईं...और मैं जब भी इस दृश्य को स्मृति में लाती हूं मेरी आखों में अनेक तसवीरें कौंध जाती हैं...जीत की बहुत सी तसवीरें और...और हार की सिर्फ एक तसवीर...
   आज साठ की उम्र में, मैं बीस की उम्र की अपनी अल्हड़ता को याद कर रही हूं...उबलते प्रेम गीतों का लिखना...सहवास की याचना करते प्रेम गीतों का लिखना...गीतों के नीचे राशि का नाम लिख कर, समर्थ जी के थैले में हर दिन चुपके से डाल देना...फिर समर्थ जी का हृदय बल्ले पर चढ़ जाना...क्लास में उनकी नजर हमेशा राशि पर टिकी रहना...बिना किसी कारण के उसकी तारीफ़ करना...उनके द्वारा चुपके से राशि को अपने घर बुलाना और...और...राशि का करारा तमाचा समर्थ जी के गालों पर अंकित हो जाना...और...और कुछ ही दिनों के बाद राशि का समर्थ जी के सामने समर्पण...उस से कथित विवाह रचाना...शायद, कुछ ही दिनों में...बहुत कुछ घटित हो गया था...
    मेरी अल्हड़ता ने एक लड़की की जिंदगी ही बदल डाली  थी...लेकिन, मुझे कोई फ़िक्र नहीं थी...जो मुझे करना था, मैंने किया...जो राशि को करना था, उसने किया...आखिर कोई वजह रही होगी कि वह समर्थ जी के आगे समर्पित हो गयी? मैं इस प्रश्न में क्यों उलझती...यह उसके जीवन का प्रश्न था...बहुत से लोग, जिन में मेरे कई मित्र भी थे, जो इस प्रश्न पर कई दिनों तक चर्चा करते रहे...कोई राशि को बोल्ड कहता तो कोई उसे कायर कहता...डौली ने धांसू डायलॉग जमाया था, शेर के गाल पर तमाचा जड़ते ही शेरनी बकरी बन गई...अकड़ ढीली पड़ गई...और हलाल हो गई...
   मेरे खेल ने राशि की जिन्दगी को एक अनूठे मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया था...किन्तु मैं अपराध बोध से जरा भी ग्रसित नहीं हुई थी...मैं शुरू से संवेदना से दूर रहने वाली, अल्हड़ लड़की थी...मैं हमेशा अपने लिए जीने वाली व्यक्ति रही...मैं हमेशा जीवन की भौतिकता में विश्वास रखती रही...मुझे बस आनंद की जिन्दगी चाहिए थी, वह पाप के मार्ग से मिले या पुण्य के मार्ग से...लेकिन, जिंदगी मिले तो उसमें आनंद हो, रोमांच हो, इश्क हो, फरेब हो...कुछ भी हो, लेकिन आनंद रहित  न हो...
    एक दिन राशि ने मुझ से पूछा, लीली, क्या मेरे नाम से प्रेम गीत लिख कर, तुम ही समर्थ जी के थैले के डाला करती थी? मैंने उन गीतों को पढ़ा है...उन गीतों की लेखन-शैली तुम्हारी ही लगती है...सच-सच बोलना...क्या यह तुम्हारी शरारत थी?
    मैंने कुछ सकुचाते हुए इतना ही कहा, मैंने तो सिर्फ मजाक किया था...चिल यार! मैं तो...
    राशि बीच में बोल पड़ी, तुम ने जो किया, वह ठीक नहीं था...और...और ठीक भी था...देखो, समर्थ जी ने मुझे बाद में बहुत प्रेम से समझाया कि प्रेम-व्रेम कुछ भी नहीं होता है...इस संसार में बस दो ही रिश्ते हैं, स्त्री और पुरुष. दोनों को एक दूसरे के लिए प्रकृति ने बनाया है. यह परिवार क्या है? बंधन है...कोरा बंधन...उन्होंने मुझ से कहा- तुम मेरे साथ कुछ दिनों तक रहो...जब तक भला लगे...जब तक मुझ में एक समर्थ पुरुष उपस्थित लगे...फिर मैं अपनी राह और तुम अपनी राह...साथी तो मिलते और बिछुड़ते ही रहेंगे...यही प्रकृति का नियम है...
   लीली, समाज के लोग मेरे और समर्थ जी के संबंध पर बहुत शरीफ बन जाते हैं और नैतिकता और चरित्र की बातें भी करने लगते हैं...पैंतालीस का दूल्हा...बीस की दुल्हन...क्या चरित्र  है...कितने में बिकी...ऐसी टिपण्णी देने वाले लोगों को झांसा देने के लिए हम दोनों ने मंदिर में जा कर शादी रचा ली...वैसे, न मैं भगवान को मानती हूं और न समर्थ जी...और सच कहूं तो भगवान को कोई नहीं मानता है...हर आदमी इस शब्द का प्रयोग, दूसरों को डराने के लिए करता है...और लोग शादी करते हैं समाज के गंदे कमेंट्स से बचने के लिए...मेरी मां भी मुझे भगवान का नाम लेकर बहुत डराती थी और स्वयं भी ख़ूब पूजा-पाठ किया करती थी...और जब पापा दूसरी के पास चले गए, तो मां की मदद में कोई भगवान नहीं आया...मां ने दुबारा गलती की और फिर से शादी कर ली...मुझे भी झेलना पड़ा एक सौतेला और शराबी पिता...
    लीली, मैं समाज की आलोचना को कोई तरजीह नहीं देती...समाज के कुछ लोगों का धंधा ही है, दूसरों के जीवन में ताक-झांक करना और नुक्कड़ वाली चाय दूकान पर एक्सपर्ट कमेंट्स देना...ऐसे लोग, अकेली रह रही बीमार बूढ़ी पड़ोसन को अस्पताल तक नहीं ले जा सकते हैं, लेकिन उस बूढ़ी औरत के अकेले रहने पर, अनेक मनगढंत कहानियां अपने दोस्तों को सुना कर, सुख का जरूर अनुभव कर सकते हैं...
   लीली, जरा सोचो, यह कितनी बुरी बात है कि लोग पूरी जिन्दगी ही नहीं, बल्कि सात जन्म के लिए शादी के बंधन में बंधते हैं...उनको जीवन की एकरसता कैसे अच्छी लगती है, मैं समझ नहीं पाती हूं...एक ही आदमी के साथ पूरी जिंदगी...एक कैद जिंदगी...मोनोटोनी...मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती...
   राशि ने मुझ से चहकते हुए पूछा, तुम ने कभी उन्मुक्त जीवन जीने की कोशिश की है? पुरुष का अनुभव किया है? पुरुष रूपी आनंद के सागर की लहरों पर कभी तैरी हो? नहीं तैरी तो तैर कर देखो...तुम इस दुनिया और इस समाज को भूल जाओगी...बस, तुम को अपनी दुनिया दिखेगी...जिस में तुम उन्मुक्त हो कर, किसी पुरुष के साथ एकाकार हो जाओगी...उस में घुल-मिल जाओगी...पुरुष तुम्हारे अंदर समा जाएगा...पूरा आनंद का सागर तुम्हारे अंदर उमड़ेगा...अनोखा...अद्भुत अनुभव है वह...प्राकृतिक अनुभव...
   मैं राशि की भौतिकवादी दार्शनिक बातों से ऊब कर बोली, देखो, राशि मैं बिलकुल अलग तरह से जिन्दगी को देखती हूं...अपनी जिंदगी का हर फैसला मैं लूंगी...मेरे पास सोचने समझने के लिए अपना दिमाग है...मैं तुम्हारी तरह किसी पुरुष की बांहों में ही आनंद को कैद नहीं पाती हूं...मैं आजाद लड़की हूं, तो हर मामले में आजाद हूं...मुझे पुरुष की गुलामी पसंद नहीं...
    राशि ने कहा, तुम्हारी तरह...कभी मैं भी सोचती थी...और यही कारण था कि जब समर्थ जी ने मुझे अपनी बाहों में आने का आमंत्रण दिया था, मैंने उनको एक तमाचा भी जड़ दिया...लेकिन मैं गलत थी...अनुभवी आदमी ही ज्ञान दे सकता है...सुख दे सकता है...वे मुझे एक अनोखी दुनिया में ले गए...मुझे इस बात की ख़ुशी है कि आज मैं एक हारी हुई लड़की की तरह नहीं बल्कि एक विजेता की तरह समर्थ जी के साथ रहती हूं...मैं चाहती हूं कि मैं जहां भी रहूं, वहां मैं लूजर न बनूं...मैं तो जीतने में विश्वास रखती हूं और मुझे हार मौत की तरह लगती है...
    मैंने राशि से कहा, खैर, अभी तुम समर्थ जी वाणी बोल रही हो...मैं यही चाहूंगी कि मैं उसकी ही बाहों में जाऊं, जो मेरी बोली बोले...
   लीली, मैं तुम्हारी नीति से सहमत नहीं हूं...समर्थ जी ने कितना ठीक कहा है-पुरुष से अलग स्त्री अस्तित्वहीन होती है...लीली, पहले मुझे भी लगा था कि समर्थ जी पागल हैं...यौन-विकृति के शिकार हैं...लेकिन, ऐसा कुछ भी नहीं है, उनके पास एक विशाल हृदय है...उनका हृदय सेवन स्टार रिजॉर्ट-सा है...और वे अपने रिजॉर्ट में बहुत-सी स्त्रियों के साथ रहना चाहते हैं...उन के साथ जिंदगी जीना चाहते हैं...और क्या यही कामना कोई स्त्री नहीं पाल सकती है...यह तो प्राकृतिक कामना है...नई-नई जगह कौन नहीं जाना चाहता...नए-नए कपड़े कौन नहीं पहनना चाहता है...गीता में भी कहा गया है कि जब एक वस्त्र पुराना हो जाता है तो आदमी नए वस्त्र को ग्रहण करता है...लीली, हम अपनी इच्छाओं को मार कर, परिवार के घेरे में सड़-गल जाती हैं. हमें इस परिवार के घेरे से बाहर निकल कर, अपने जीवन को सार्थक, प्राकृतिक और समर्थ बनाना होगा...हमें मुक्ति की मांग करनी होगी...
  मैंने राशि से पूछा, खैर, तुमको समर्थ जी कैसे लगे...तुम को उन्होंने प्रथम मिलन पर क्या दिया? 
  राशि ने कहा, समर्थ जी सच्चे अर्थ में पुरुष हैं...प्राकृतिक पुरुष हैं...उन में कुछ भी बनावटी नहीं है...उन्होंने पहले मिलन के बाद, मुझे अपनी कार से मेरे बेस्ट फ्रेंड कामेश के पास भेज दिया...जीवन में मुझे जो चाहिए था दो ही दिनों में मिल गया...कामेश से मिलन का अवसर, समर्थ जी के द्वारा मुझे दिया गया पहला गिफ्ट था...और उस दिन से मैं उन्मुक्त जीवन जी रही हूं...प्राकृतिक जीवन जी रही हूं...लगता है कि पृथ्वी पर खड़ी हो कर आकाश को छू रही हूं...
   राशि, तुमने अपने होने वाले बच्चे के भविष्य के बारे में कुछ सोचा है?
   बच्चे? ये बच्चे कहां से आ गए? जब मैं उनको लाना चाहूंगी तभी वे आएंगे...लीली, हम कितना बड़ा पाप करते हैं, जब किसी बच्चे को उसकी मर्जी के बिना, इस बंधन वाले संसार में, इस कुंठित समाज में उतार देते हैं...खैर, जब बच्चे होंगे तो उनके बारे में सोचा जाएगा...अभी से इन बातों पर चिंता करना, अपना दिमाग खराब करने के बराबर है...अभी मैं उन्मुक्त जीवन जी रही हूं...मैं तो प्रकृति के करीब आ गई हूं...जीवन के करीब आ गई हूं...मेरे ऊपर कोई बंधन नहीं है...मेरी दुनिया में लोकलाज के साथ-साथ चलने वाला शोषण नहीं है...यहां सिर्फ आनंद है...प्राकृतिक मिलन है...भौतिक संबंध है...प्रकृति की दो कृतियों की सांसों का सरगम है...और लीली, मैं तुमको एक बात साफ़ बता देना चाहती हूं कि तुम अपने कुंठाग्रस्त और दकियानूसी विचारों के साथ उन्मुक्त जीवन नहीं जी सकती हो...तुम वही पारम्परिक जीवन अपनाओगी और रसोई के धुएं में एक दिन मर-खप जाओगी...तुम अपने पति की सेवा में तब तक लगी रहोगी, जब तक वह कब्र में नहीं समा जाता या तब तक, जब तक तुम इस दुनिया से विदा नहीं ले लेती हो...तुम को पति के साथ जीवन गुजारने के लिए, पूरी जिंदगी अपनी जिंदगी से दूर हो रहना पड़ेगा...तुम अपनी जिन्दगी भूल जाओगी...तुमको एक गुलाम की तरह जीना होगा...बच्चे स्कूल गए कि नहीं...पति का जूता पालिश किया कि नहीं...पति के पीए लतिका के लिए बर्थ दे गिफ्ट लायी या नहीं...इन्हीं फ़ालतू के कामों में तुम तीस वर्ष में ही आंटी जी बन जाओगी...तुम कभी मेरी तरह बन कर देखो...तुमको एक कामयाब जिंदगी मिलेगी...
   मैं राशि की बात सुन कर मन ही मन हंस रही थी. उसे मूर्ख समझ रही थी. लेकिन, मैं यह जान चुकी थी कि समर्थ जी की रसिकता उसे भा गई है. वह उनके साथ रहती हुई, कई अन्य दोस्तों के साथ भी संबंध बना रही थी. और अपने दोस्तों से उन संबंधों की खुल कर चर्चा कर रही थी. वह इस स्थिति में पहुंच गई थी कि वह कुछ भी कर सकती थी. और उस ने वह सब कुछ कर दिखाया जो कभी उस के वश में नहीं था. वह अपने सामर्थ्य की सीमा को लांघ कर, आगे बढ़ी चली जा रही थी. और उसकी प्रगति देख कर, उस की लोकप्रियता देख कर, उस की सामाजिक प्रतिष्ठा देख कर, मुझे उस से ईर्ष्या होने लगी थी. जलन होने लगी थी. मन करता था कि मैं राशि का गला ही दबा दूं...टीवी खोलती तो राशि कविता पाठ करती नज़र आती...रेडियो ऑन करती तो उसी के गीत...मेरा वश चलता तो मैं उसे आग के दरिया में डाल देती...राशि ने मेरी आखों से नींद चुरा ली थी...वह मेरे मन पर परजीवी की तरह उग आई थी...मैं जब भी सोने की कोशिश करती तो मेरे मानस पटल पर एक रंगमंच बन जाता और उस रंगमंच पर मैं राशि और समर्थ को  ठहाके लगाते हुए देखती...एक दूसरे में खोते हुए देखती...एक दूसरे को चूमते हुए देखती...आखिर, राशि ने जो कुछ पाया था, वह मेरे ही गीतों के प्रभाव से उसे मिला था...उसने मेरे ही खेल से समर्थ को पा लिया था और वह बड़ी तेजी से साहित्य के आकाश में बुलबुल बन गई थी...
    मैं क्या कहूं...जब उसे ने उस दिन कॉलेज कैंटीन में कविता सुनाई तो लगा मैं मर जाती तो बेहतर था...वह कविता सुना रही थी- मैं खुले आकाश की पाखी हूं...आओ, मेरे साथ हिमालय की ओर चलो...प्रणय स्थल की ओर चलो...वहां की शीतल हवा में...कुछ मादकता तो घोलो...कुछ गरमाहट तो भरो...ओ नर पाखी! कुछ प्रेम की टेर तो लगाओ...आकाश में कुछ देर नर्तन तो करो...हौले-हौले छेड़ो तो मुझे...हौले-हौले सहलाओ तो मुझे...अपने आगोश में...जरा लो तो मुझे...अपनी सनसनाती दुनिया में...जरा ले चलो तो मुझे...और राशि के पंद्रह-बीस साथी तालियां बजा रहे थे...और मैं दूर...अकेली बैठी...कविता सुन कर तिलमिला गई थी...  
   उस दिन मैं अपने कमरे में बैठी बहुत बेचैनी महसूस कर रही थी. मैं खिड़की के पास आ कर खड़ी हो गई. खिड़की के ठीक सामने नीम का एक पेड़ था. पेड़ पर एक घोंसला था. उस घोंसले में पक्षियों का एक जोड़ा रहता था. उस घोंसले में रहने वाले नर और मादा पक्षियों को पहचानती थी. एक दिन एक अनजान युवा नर पक्षी आया और उसने घोंसले पर हमला कर दिया. उस युवा नर पक्षी ने घोंसले और मादा पक्षी, दोनों पर कब्ज़ा कर कर लिया...अपनी मादा से विलग कर दिया गया बेचारा कमजोर नर पक्षी दूर एक डाली पर अपने टूटे पंख को ठीक कर रहा था...और अपनी मादा को देख रहा था, जिसे दूसरा युवा नर पक्षी स्नेह से चूम रहा था...और...और वह मादा भी अपने नए साथी के साथ आनंदित नजर आ रही थी...इस घटना पर मैंने कुछ देर तक सोचा और फिर मैंने तय कर लिया कि मैं राशि को अपने सामने जीतने नहीं दूंगी...मैं उसके घोंसले में प्रवेश कर, उसे विस्थापित कर दूंगी...मैं उसे बता दूंगी कि लीली भी कम नहीं है...और मैं भी समर्थ जी के मन के द्वार पर प्रेम गीत गाने लगी...और समर्थ जी ने मेरे गीतों को शराब मान कर पीना शुरू कर दिया...वे जल्दी ही मेरे लिए समर्थ जी से समर्थ हो गए...वे घंटों मेरे गीतों को सुनते...मेरे हर गीत पर मुझे बाहों में भर कर कहते-
   कमाल के गीत हैं...तुम्हारे दिल से निकले और सीधे मेरे दिल में पहुंच गए... वे कभी मुझे चूम लेते...धीरे-धीरे मैंने समर्थ को जीत लिया...समर्थ मेरे सामने हार गए थे...मैंने अपनी शर्तों पर उन से दोस्ती बना ली थी...और मैं राशि की उपस्थिति में, समर्थ के घर जाती...उसके कथित पति समर्थ के साथ, उसके बेड रूम में रहती...और दो-चार दिन समर्थ के घर पर रहने के बाद, अपने घर लौटती हुई, मैं राशि को अलविदा कहना नहीं भूलती थी...राशि मुझे दिखावटी मुस्कुराहटों के साथ विदा किया करती थी...अपना खुलापन दिखलाने की कोशिश किया करती थी...अपनी उन्मुक्तता दिखलाने का ढोंग किया करती...लेकिन, उसकी मुस्कुराहट के पीछे की पीड़ा मैं ही पढ़ सकती थी...जब उसे मेरे लिए कॉफी बनानी पड़ती...मेरे लिए बेड सजाना पडता...बेड रूम में फूलों का गुलदस्ता रखना पड़ता...मेरे अंग-अंग की सुंदरता की बड़ाई करनी पड़ती...वह मुझे अंदर से रोती हुई नजर आती...और तब मुझे उसके शब्द याद आते- मुझे इस बात कि ख़ुशी है कि आज मैं एक हारी हुई लड़की की तरह नहीं बल्कि एक विजेता की तरह समर्थ जी के साथ रहती हूं...मैं चाहती हूं कि मैं जहां भी रहूं, वहां मैं लूजर न बनूं...मैं तो जीतने में विश्वास रखती हूं और मुझे हार मौत की तरह लगती है...समर्थ जी ने मुझे उन्मुक्त जीवन दिया है...जीवन की यह उन्मुक्तता, परिवार बना कर प्राप्त करना संभव नहीं था...लीली, हम लड़कियां अपनी इच्छाओं को मार कर, परिवार के घेरे में सड़-गल जाती हैं...
   उस दिन राशि कॉमन रूम में अपने मुक्त ग्रुप के साथ अपनी मुक्ति का आनंद ले रही थी. मैं पास की ही एक टेबुल पर चुपके से आ कर बैठ गई...वह चहक-चहक कर बोल रही थी-
   अरे क्या बताएं, जब समर्थ जी के साथ मैं पहली बार बेड पर गयी तो मैं बांस के पत्ते की तरह कांप रही थी...लेकिन, समर्थ ने जिस कौशल के साथ, मुझे अंगीकार किया कि मैं भूल गई कि मैं भी कोई हूं...मैं आनंद के सागर में गोते लगा रही थी...फिर भी जायका बदलने के लिए, कभी इसके या कभी उसके साथ इंजॉय कर लेती हूं...
   लतिका ने पूछा, अरे, तेरा विजय रेसलर के साथ कैसा रहा...कहीं तुम को देख कर भाग तो नहीं गया!
   अरे, तुम तो जानती ही हो कि मुझे लूजर लोगों से बहुत चिढ़ है...फिर भी, उस लूजर को मैंने बहुत हिम्मत दिलाई...मन कर रहा था कि उसे मैं बिस्तर से उठा कर ठंडे पानी से भरे बाथ टब में डाल दूं...लेकिन, दोस्त अगर साथ दे तो लूजर भी विनर बन सकता है...उसके साथ का अनुभव भी बहुत निराला है...मुझे लड़के की तरह उसके साथ पेश आना पड़ा...वह लूजर...
   वह लूजर, बोलते ही राशि चुप हो गई...उसकी नजर मेरे ऊपर पड़ गई थी...
   बहुत मुश्किल से अपने को नार्मल करती हुई राशि ने मुझे विश किया. वह मुझ से बोली, लीली, अकेली क्यों बैठी हो? हमारे मुक्त ग्रुप में शामिल हो जाओ...
   नहीं...तुम्हारे मुक्त ग्रुप के बंधन में नहीं पड़ना चाहती हूं...मुझे जीवन में कोई बंधन स्वीकार नहीं...मैं अकेली ही दुनिया में आई थी और अकेली ही दुनिया से कूच करूंगी...
   फिर भी, तुम हम लोगों के साथ बैठ सकती हो...
   नहीं, मैं अपनी जगह पर ठीक हूं...एक कप कॉफ़ी लूंगी और फिर निकल जाऊंगी अपने घर...तुम लोग एन्जॉय करो...
    मेरे रूखे व्यवहार पर भी राशि मुस्कुरा कर रह गई...लेकिन, उसकी मुस्कुराहट के पीछे उसका क्रोध झलक रहा था...मैं जानती थी कि राशि के लिए तो समर्थ एक जेब है...उस ने बहुत गरीबी झेली थी...घर में रहते हुए उसने बहुत कष्ट झेले थे...आर्थिक कष्ट और मानसिक कष्ट भी...उसे अपने सौतेले बाप को भी झेलना पड़ा था...समर्थ जी को पा कर कम से कम उसकी आर्थिंक परेशानी दूर हो गई थी...और मुझे पैसे की कोई चिंता नहीं थी...मेरे पापा बहुत अमीर व्यापारी थे...मेरा एक ही भाई था, सोमेश, जो मुझ से बहुत छोटा था...ममा और पापा जब एक कार दुर्घटना में शिकार हो गए तो उनके व्यापार को मैं ही देख रही थी...सोमेश बोर्डिंग स्कूल में अध्ययन कर रहा था...अपने सुदृढ़ आर्थिक आधार, अपने गीत कौशल और अपने व्यक्तित्व से, मैंने उस समर्थ को जीत लिया था, जो अविजित समझा जाता था...और मैंने राशि को समाप्त कर दिया था...मैंने राशि की राशि ख़राब कर दी थी...राशि समर्थ की आलमारी का एक और खिलौना मात्र थी...गूंगी, बहरी और अंधी...और समर्थ मेरी उंगलियों पर नाचने वाला दिग्गज शिक्षक था...गीतकार था...दार्शिनिक था...मेरा दोस्त था...और मैं अपने आप में प्रफुल्लित थी...
    समय के पंख होते हैं...भाई सोमेश ने अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद, व्यापार में मेरा हाथ बंटाना शुरू कर दिया  था...और उस ने एक दिन मुझे चौंका दिया-
    दीदी, आज मैं एकाउंट चेक कर रहा था...आप बहुत-सा पैसा होटलों को पे करती हैं...यहां अपना घर है फिर होटलों पर हर महीने दो से तीन लाख का खर्च क्यों? हम पैसों का बेहतर इन्वेस्टमेंट कर सकते हैं...
    अरे, अब तुम मेरे द्वारा खर्च किए गए पैसों का हिसाब मुझ से लोगे?
    नहीं, मैं हिसाब नहीं ले रहा हूं...मैं एक सलाह दे रहा हूं...मेरा एक सपना है, एक नए व्यापार को शुरू करने का...
   ठीक है, मैं कल ही व्यापार का बंटवारा कर दे रही हूं...
   मुझे लगा था सोमेश मेरे इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देगा, लेकिन उसने तुरंत कहा-
   यही ठीक रहेगा... और यह कह कर वह अपने कमरे में चला गया था.
   मैंने व्यापार का बंटवारा कर दिया. इस बंटवारे के बाद मैं थोड़ी सिमट गई थी...लेकिन, फिजूलखर्ची मेरी आदत थी. मैं जल्दी ही पैसे-पैसे की मोहताज हो गई थी. मुझे अपने हिस्से की जमीन और फ़्लैट बेचना पड़ गया. मैं किराए के फ़्लैट में चली आई...प्रारंभ में, मैंने हाथ आए पैसों का निवेश बहुत सोच समझ कर किया...
    एक दिन समर्थ मेरे फ़्लैट में आए...रात भर मेरे साथ रहे और विश्व भ्रमण का कार्यक्रम बनाया, लीली, इस भ्रमण में तुम होगी और मैं होऊंगा...हम दोनों अनुपम कहानी रचेंगे...लेकिन क्या बताऊं मेरे पास इन दिनों पैसों की कमी है...यह सुंदर सपना कैसे पूरा होगा...
   समर्थ, मैं लगाऊंगी पैसे...हमारी दोस्ती के बीच पैसे का क्या मूल्य...मेरे पैसे लगें या तुम्हारे, इस में क्या फ़र्क पड़ता  है...
   और विश्व भ्रमण के बाद जब मैं लौटी तो मेरे पास व्यापार के लिए पैसा नहीं रह गया था...मैंने एक संस्थान में शिक्षक के रूप में काम करने लगी...जीवन की गाड़ी किसी तरह चलती रही...
    कुछ वर्षों बाद, राशि ने एक बेटी को जन्म दिया. मैंने ही उस की बेटी का नाम रोशनी रखा...रोशनी का पिता समर्थ था या कोई और, मैं कह नहीं सकती...लेकिन, रोशनी पर पूरा नियंत्रण मेरा था...मैंने उसे इस बात का अहसास करा दिया था कि मैं ही उस के लिए सब कुछ हूं...और राशि एक मामूली सी औरत है जो घर का काम-काज देखती है...वह राशि को मां मानती ही नहीं थी...जब भी देहरादून बोर्डिंग स्कूल में अवकाश होता तो रोशनी सीधे मेरे पास चली आती...मुझे इस बात से बड़ा सुख मिलता कि राशि न समर्थ को अपने वश में रख पायी और न अपनी बेटी रोशनी को...जीवन के हर फलक में मैंने राशि को राशिहीन बना दिया था. मूल्यहीन कर दिया था...
   समर्थ से वर्षों मेरा संबंध बना रहा...वह उम्र में मुझसे बीस साल बड़ा था. वह बहुत जल्दी बूढ़ा हो गया...ब्लड प्रेसर और सूगर की बीमारियों से ग्रस्त हो गया...फिर भी मेरी उस से दोस्ती बनी रही...मैं जब भी उसके घर जाती, मैं राशि को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं गंवाती...उसे मेरे द्वारा अपमानित होने की आदत सी हो गई थी...अगर मैं किसी दिन उसे अपमानित नहीं करती तो वह मुझसे बहुत बेबाकी से पूछ लेती- लीली, क्या बहुत जल्दी है? कहीं जाना है क्या? तुम ने आज मुझे प्रिक किया ही नहीं...कोई नया घाव भी नहीं दिया...आज तुम ने मेरी बढ़ती हुई चर्बी और उम्र पर बात ही नहीं की...कोई लेक्चर नहीं दिया? तुम ने आज समर्थ की देखभाल के संबंध में मुझे डांट भी नहीं लगाई... तुम ने आज समर्थ से कहा ही नहीं कि मेरी किस फूहड़ता को तुम ने डिसलाइक किया...
   
    और...और...एक दिन समर्थ गुजर गया...समर्थ की मौत की खबर सुन कर मैं उसके घर पहुंची और उसकी विदायी की समस्त तैयारियां मैंने ही कीं...उसे विदा भी कर दिया और उस दिन के बाद, मैं समर्थ के घर नहीं गई...राशि समर्थ के घर में अकेली रह गई थी...मैंने राशि से बात करना भी छोड़ दिया था...राशि ने मुझे एक दिन फोन किया-
    कैसी हो लीली? अब तुम आती ही नहीं हो...
    समर्थ जब तक जीवित था तब तक तो मेरा वहां आने का कुछ अर्थ था. अब मैं अपने ही दरबे में ठीक हूं...रोशनी आई थी...उसे तुम से मिलने का मन नहीं था...वह आज ही वापस  देहरादून चली गई...उसकी फीस डाल देना... छोटा सा जवाब दे कर मैंने फोन रख दिया.
   समर्थ की मौत के एक दो साल गुजरे होंगे कि मैं आर्थिक तंगी से घिर गई. जिस संस्थान में मैं पढ़ाती थी उस से मेरा कांट्रेक्ट समाप्त हो गया था. मैंने कुछ अन्य संस्थानों से संपर्क किया, लेकिन कहीं से कोई कांट्रेक्ट मुझे नहीं मिला. पास पड़ोस के लोगों से मैंने संपर्क कर कहा कि वे अपने बच्चों को मेरे घर भेज दें, मैं उनको ट्यूशन दिया करूंगी. किन्तु किसी ने अपने बच्चों को मेरे पास ट्यूशन के लिए नहीं भेजा. पास में रहने वाली शिल्पा जी ने तो मुझे साफ़ कह दिया, आपका इतिहास जानने वाला कोई भी व्यक्ति आपके पास अपने बच्चे पढ़ने के लिए नहीं भेजेगा... मुझे फ़्लैट का किराया चुकता करना, मुश्किल हो रहा था. मकान मालिक ने मुझे फ़्लैट खाली की नोटिस दे दी थी.
   सारी परिस्थितयों को देखती हुई, मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला ले लिया था...मैंने उस फैसले को अमल में लाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी...मैंने बेड पर स्टूल सेट कर लिया था...पंखे से मेरी लाल चुनरी झूल रही थी...वही चुनरी जिसे समर्थ ने मुझे बनारस में खरीद कर दिया था और कहा था-यह चुनरी तुम्हारे लिए नहीं, अपने दकियानूस समाज के लिए दे रहा हूं...जिसे हम दोनों का साथ गुनाह लगता है...और...और तभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी...मैं समझ गयी थी कि किराए का पैसा लेने फ़्लैट का मालिक आया होगा...मैंने अपना बेड रूम बंद किया...पर्स से पैसे निकाले और मैंने दरवाजा खोला...सामने...सामने...राशि खड़ी थी...
    लीली, मैं तुमको लेने आई हूं...एक तुम ही तो हो मेरे जीवन में जिस से मैंने समर्थ को हारते हुए देखा...यह रही घर की चाबी...यह रही समर्थ की संपत्ति और उसके बैंक खाते के कागजात...मैं एक वीनर को लूजर बनते नहीं देख सकती...चलो अपने घर चलो...
    और मैं राशि को एकटक देखे जा रही थी...मैं अपने आप से पूछ रही थी...कौन लूजर?
       
    

    

बुधवार, 7 सितंबर 2011

रामलीला


रामलीला
कहानी
दिलीप कुमार तेतरवे

"अरी चुनरी, तुमने कितने पैकेट गुझिया बेच लिए?"
"अरे झुनकू, अब यह सब मत पूछो, बूढा अपनी भूख हड़ताल तोड़ने जा रहा है। कल तक तो हम लोग मस्ती में थे।बारह का गुझिया पंद्रह-बीस में बेच रहे थे। अब बूढा अनशन तोड़ देगा और तमाशा खत्म और हम लोग फ़िर से कूड़े के ढेर पर प्लास्टिक और लोहा चुनना शुरू कर देंगे।"
"लेकिन बूढा तो अभी माइक पर कह रहा था कि वह बीस दिन तक भूखा रह सकता है और तुम कह रही हो कि वह अनशन तोड़ रहा है।"
"हम सही कह रहे हैं। अभी उ लेडी यही बात कह रही थी, जो मंच पर बूढे की बगल में बैठी है।"
तभी चुनरी के पास एक चक-चक सफ़ेद कुर्ता पाजामा में एक लड़का आया और बोला,"ओए छोकड़ी, गुझिया के साथ मीनरल वाटर भी रखी है क्या? साला! वन्दे मातरम बोलते-बोलते गला सूख गया है।"
"जी, मेरे पास गुझिया और पानी है, लेकिन …।"
"अरे! तुम्हारे हाथ में तो मिनरल वाटर ही है। चलो, एक पैकेट गुझिया और एक बोतल वाटर दे दो…कितना लोगी?"
"दोनों मिला के पैंतीस रुपए, बस"
"अरे ससुरी, मजमा देख के रेट बढा दी है…ठीक रेट लगाओ, नहीं तो पुलिस से पकड़वा देंगे।"
पता नहीं चुनरी में अचानक कहां से इतनी ताकत आ गई कि उसने तेज स्वर में कहा," पुलिस की धमकी मत दो भैया जी…मेरे पास लूट का माल नहीं है…"
"अरे! हमको ताव दिखाती है…देंगे एक झांपड़ कि दिमाग ठीक हो जाएगा……बोलो तीस में दोगी?"
"नहीं, एक पैसा कम नहीं लूंगी।"
शायद, चुनरी का तेवर देख कर वह युवा नेता डर गया। शायद, उसे भीड़ का भी खौफ़ रहा हो। उसने पैंतीस रुपए चुनरी को देते हुए कहा," चलो, तुमको पैंतीस ही दे देते हैं, कौन मेरी कमाई का पैसा है। पार्टी से मिला है। हम तो तीन-तीन वोलेन्टीयर का पैसा आज उठा चुके हैं……एक बार, रहीम बन कर, एक बार रमेश बन कर और एक बार अमिताभ बन कर, हा, हा, हा," वास्तव में वह तो अपनी झेंप मिटा रहा था।

      तभी एक भारी भड़कम व्यक्ति चुनरी के निकट आ कर खड़ा हो गया। वह फ़ोन पर किसी से बात कर रहा था…"अजी, लोग ऐसे ही मुझको महासागर जी नहीं कहते हैं……देखिए, आप इस बात का चिन्ता मत कीजिए कि आप ने क्या घोटाला किया है। आपकी चिन्ता, अब मेरी चिन्ता है……अरे आप सात खून कर भी आयेंगे तब भी हम आपको बाइज्जत बरी कराने की ताकत रखते हैं…ऐसे ही लोग मुझे महासागर जी नहीं कहते हैं……अरे हम तो खानदानी वकील है…मेरे बाप-दादा तो कितनों को फ़ांसी के फ़ंदा से उतार कर घर पहुंचाए हैं, उ तो आप जानते ही होंगे…हा, हा, हा, देखिए, अभी हमको भ्रष्टाचार पर तगड़ा विचार, सामने वाले  मंच से रखना है, सो हम आपके घोटाले के केस पर देर रात, बोतल पर बात करेंगे, हा, हा, हा। अभी समाज सेवा कर रहे हैं और रात में आपकी सेवा करेंगे…लेकिन आपको मेरा ब्रांड याद है न? हा, हा, हा……।" मोबाइल बंद करते हुए उसने अपने पीछे आ रही एक लड़की से कहा,"लेक्चर देते समय का मेरा फ़ोटो जरूर खींच लेना, कई एंगल से, बड़ा काम देगा, मुवक्किलों को लु्भाने में।"
"ठीक है सर!"
महासागर जी ने चुनरी की ओर मुड़ते हुए कहा,"ओय, पानी पिला।"
चुनरी ने भांप लिया था कि आदमी मालदार है, इसलिए उसने कहा,"जी तीस में एक बोतल मिलेगा।"
"पैसा का काहे चिंता करती है रे।" यह कह कर उसने अपने पीछे खड़ी लड़की से कहा,"लीजा डीयर, इस छोकड़ी को तीस की जगह, पचास रुपए दे दो…बहुत गरीब लगती है…"
"येस सर!" लीजा ने कहा और चुनरी को पचास रुपए दे दिए।
चुनरी दौड़ कर झुनकू के पास पहुंची और बोली," जानते हो, वह मोटा आदमी मुझे अपने मन से एक बोतल पानी का पचास रुपया दे गया है।"
"अरे, वह पगला तो मुझको कल, पंद्रह के बदले सौ रुपए दे गया था। लगता है, इस मोटे के पास रुपए का पेड़ है!"
"अरे उसके पीछे-पीछे जो लड़की चल रही है, उसके पास बैग में बहुत सा रुपया है……और जानते हो, रूपेश की उस बैग पर नजर पड़ गयी है।"
"तुम चुप रहो चुनरी…देखना,रूपेश आज पाकिटमारी करते हुए पकड़ा जाएगा…अरे, अरे, रूपेश तो उस लड़की के ठीक पीछे पहुंच गया है।"
" और, और, झुनकू, उसने उसके बैग में हाथ भी डाल दिया है…नोट का एक बंडल भी निकाल लिया है।"

       कुछ लड़के नारा लगा रहे थे," हाथ हमारा नहीं उठेगा, हमला चाहे जैसा होगा।" इनमें से कुछ ने रूपेश की हरकत को देख लिया और नारा रोक कर, अपने हाथ के झंडे पताके फ़ेंक कर, रुपेश पर पिल गए। लात-जूते चलाने लगे। रूपेश लहू-लुहान हो गया। फ़िर पुलिस आई और रूपेश को पकड़ कर गाली-गलौज देते हुए हिंसक लड़कों से छुड़ा कर ले गई। इस बीच चुनरी और झुनकू दम साधे बैठे रहे। एक दो बार तो वे भी पुलिस की पकड़ में आ चुके थे, सो उनको भी पुलिस का डर हो गया था कि कहीं दारोगा जी उन दोनों को तो नहीं पहचान लेंगे। लेकिन दारोगा जी की उनपर नजर ही नहीं पड़ी। रूपेश का मामला समाप्त होते ही, वे दोनों फ़िर बतियाने लगे।
"झुनकू, मैं भी बड़ा हो कर सामाजिक संगठन बनाऊंगी।"
"मूरख चुनरी! मैं तो बड़ा हो कर असामाजिक संगठन बनाऊंगी। मुझको दो-चार कट्टे जुगाड़ने होंगे, बस।"
उन दोनों की बात एक बूढा आदमी सुन रहा था। उसने झुनकू को टोका," अरे बेटे, ये कैसी बात कर रहे हो? तुम बड़ा हो कर अपराधी बनना चाहते हो?"
झुनकू ने बिना हिचके जवाब दिया," नही सर! मैं तो अपने इलाके के गोगा पहलवान की तरह बनना चाहता हूं। वह भी पहले हम लोगों की तरह गरीब था। कोयले चुन कर खाना जुगाड़ता था। अब देखिए, उसके घर में क्या नहीं है। दारोगा जी उसको रोज सलाम ठोंकते हैं। उसने भी तो दो कट्टे से असमाजिक संगठन बना कर धंधा शुरू किया था। अब वह चुनाव भी लड़ने जा रहा है।"
बूढे ने लम्बी सांस ली और कहा," हे भगवान! ये कैसी रामलीला?"

गुरुवार, 16 जून 2011

कामदेव

                                                                         स्वामी कामदेव

*दिलीप कुमार तेतरवे

             " क्या बात  है जो तुम इतने खुश हो?"
             "मेरी जेब गरम है!"
             "वेतन मिला क्या?"
             "अरे, मैं तो वेतन  सीधे बैंक में जमा  कर देता हूँ. वेतन से क्या होने वाला है?"
               सचिन की बात सुन कर मैं तो दंग रह गया. लेकिन, आज यही तो जीवन का उद्देश्य है. मैं सोचने लगा कि कहीं सचिन भी आगे चल कर कुणाल की तरह सन्यासी न बन जाये! मुझे कुणाल  याद आने लगा. वह मेरे साथ पढता था. पढता क्या था, स्कूल में तो वह बस लम्पटई करने ही आता था.... वह योग के क्लास करने लगा. मैंने उससे पूछा," अरे कुणाल, अचानक तू योग क्यों सीखने लगा? सन्यासी बनने का इरादा है क्या?" 
               कुणाल ने ठहाका लगाते हुए कहा,"यार, योग के क्लास में कई लड़कियों ने दाखिला लिया है. बस, मैंने भी ले लिया. इसी बहाने सुंदरियों  के साथ गपियाने का मौका मिल जाता है.  वह रश्मि है न, क्या कहूँ बहुत ही  सुन्दर है. मैं तो  उसे योग करते देखना चाहता था. बस, योग के क्लास में  मैं उसे देखता रहता हूँ ."         
               समय बड़ी तेजी से बीता. मैंने पचास की उम्र पार कर ली. पत्नी सुनंदा को तीर्थ करने का मन था और बनारस जा कर किसी सन्यासी से गुरु दीक्षा भी लेने का  इरादा  था. हम दोनों ही बड़े धार्मिक विचारधारा वाले थे. सो हम दोनों बनारस पहुंचे.        
              मैं और सुनंदा असी घाट पर  टहल रहे थे. अचानक सैकड़ों  भगवाधारी सड़क की और से घाट की और आते दिखे. भगवाधारियों के बीच   गोरा सा एक सन्यासी था.  मुझे उसकी सूरत कुणाल से बिलकुल मिलती जुलती लगी. जब वह मेरे पास से गुजर रहा था तो मैंने उसे गौर से देखने की कोशिश की. उस सन्यासी ने भी मुझे  देखा और हुए बोला ," अरे सत्यप्रकाश, यूं आँखे फाड़ कर क्या देख रहे हो?. मैं हू  स्वामी कामदेव. जिसे कभी तुम्हारे जैसे दोस्त  कुणाल  कह कर पुकारा करते थे....कहो शिव की नगरी बनारस में क्या कर रहे हो?"

             "मैं  एक गुरु की तलाश में आया हूँ."
             "अरे तुम तो क्लास के गुरु थे और अब तुम गुरु की तलाश  कर रहे हो! खैर, कहाँ ठहरे हो ?"
             "अघोरिया धर्मशाला में."
             "अरे मेरा आश्रम है ." यह कह कर उसने एक सूटेड-बूटेड आदमी से कहा,"रामकृष्णन,  सत्यप्रकाश  जी और  भाभी जी को  आश्रम में ठहरा दो." फिर उसने मुझे कहा,"सत्यप्रकाश, मेरे महासचिव  रामकृष्णन के साथ जाओ. तुम मेरा इंतजार आश्रम में करना."
           जब मैं आश्रम पहुंचा तो मैं हैरान रह गया. आश्रम को देख कर." मेरी पत्नी सुनंदा ने कहा," यह आश्रम  है या राजा  का महल....या फाइव स्टार होटल?"
           आश्रम के सेवकों ने हम दोनों को तुरत ही एक सुंदर से सूट में पहुंचा दिया. एक सेविका ने  मेरे खाने की पसंद पूछी और जाते-जाते सूचित कर गयी ," आपके लिए कैब बुक है और ये हैं पचास हजार रुपए, आप चाहें तो भाभी जी के साथ जा कर मार्केटिंग कर सकते हैं."
         मैं और सुनंदा तो इस नए ज़माने के स्वामी की  दरियादिली को देख कर आश्चर्य में  थे.
         देर रात स्वामी कामदेव ने मुझे अपने कमरे में बुलाया. स्वामी के कमरे का वैभव देख कर मुझे लगा कि जैसे  मैं इंद्र के शयन कक्ष  में पहुँच गया होऊं.
          "आओ सत्यप्रकाश, आओ...." स्वामी ने चहकते हुए कहा
          "इतनी रात गए तुम वापस लौटे हो?" मैंने पूछा.
          "अरे यार, आज तो जरा जल्दी आ गया हूँ. आज मेरी कंपनी की मीटिंग थी. अभी यह  दो हजार  करोड़ की कंपनी है और मैं इसे इसी साल पांच हजार करोड़ की कंपनी में बदलना चाहता हूँ." तभी एक सेविका ने उसकी और मोबाइल बढ़ाते हुए कहा,"स्वामी जी, मारीशस से  कंपनी सर का फोन है."
              कंपनी सर  का नाम सुनते ही मैं तो सकते में आ गया. यह तो एक बड़े हवाला कारोबारी  का नाम था. लेकिन, स्वामी ने मोबाइल पर अपनी बात ठहाका लगते शुरू की," अरे यार, मुझे तीन हजार करोड़ चाहिए. ऐसी सेटिंग  के साथ मेरी  स्वामी हर्बल कम्पनी के खाते में रूपये भेजो कि लगे कि कंपनी ने असली कमाई की है. तुम मेरे लेखापाल से   और चार्टर्ड एकाउंटेंट  से मिल लेना. ओके "
            कंपनी सर से बात समाप्त करने के बाद स्वामी मुझसे बतियाने लगा. पूछने लगा कि मैं क्या कर रहा हूँ..मेरे बाल-बच्चे क्या कर रहे हैं. लेकिन तभी एक सेविका ने उसकी ओर  मोबाइल बढ़ाते हुए कहा," नागपुरवाले नेता जी का फोन है." स्वामी ने नेताजी से बात शुरू की-
           " नमस्कार जी, मैं इस सरकार को उलट दूंगा,  बस आप मेरा साथ दें...यह सरकार, मेरी  संपत्ति  की जांच कर रही है."          
           "अरे स्वामी जी, हम आपको खुला समर्थन देंगे. आप योजना पर काम तो शुरू कीजिए. हमें तो सरकार ही नहीं यह संविधान भी बदलना है."
           "हाँ जी, मैं भी यही चाहता हूँ. मैं चाहता हूँ कि हर चौराहे पर नत्थू की प्रतिमाएं लगायी जाएँ. आधी धोती वाले  की प्रतिमाएं, मैं  बर्दाश्त नहीं कर पाता हूँ."
         
          " जी, आपकी कमाना पूर्ण होगी.".......

           मैं कामदेव से विदा लेना चाहता था, लेकिन तभी उसने सेविका से कहा, " अब कोई फोन नहीं रिसीव करूंगा. मुझे अपने मित्र से बातचीत करनी है."        
           उसने मेरी और देखते  हुए कहा ," यार,  मेरे साथ काम करो. मुझे कुछ भरोसे वाले साथी चाहिए. तुम पैसे की चिंता नहीं करना. प्रति वर्ष दस लाख  दूंगा, कहो स्वीकार है?"
            मैं तुमको अपनी राय  कल बताऊंगा."
            दूसरे दिन, मैं अपनी पत्नी के साथ सुबह ही आश्रम से निकल गया और जाते हुए एक लिफाफा कामदेव बाबा के लिए छोड़ दिया. लिफाफे में उसके दिए पचास हजार रूपये, एक पत्र और पांच हजार रूपये का चेक  डाल  दिया था. पत्र में मैंने लिखा था-प्रिय कुणाल, मैं तो बनारस  गुरु की तलाश में आया था. लेकिन अब मेरा फैसला है कि  मैं अपने जीवन में कभी  गुरु तलाशने की  कोशिश नहीं करूंगा!"
                                                                                                          *

रविवार, 15 मई 2011

खंडहर





खंडहर
*दिलीप तेतरवे  


आदमी से ज्यादा आदमी को जानवर पहचानते हैं. कालू सुबह से ही लगातार भूंक रहा था. और जब उसने देखा की एक बुलडोजर पड़ोस की झोंपड़ी को उजाड़ रहा है, तो समझ गया था कि आज कुछ गलत होने ही वाला है. सो, उसने जब बुलडोजर को अम्मा की झोंपड़ी की और बढ़ते देखा तो अपनी पूरी ताकत के साथ कभी बुल डोज़र  पर तो कभी लाठी भांजते, गालियाँ बकते सिपाहियों पर भौंकने लगा .अपने नुकीले दांत दिखा कर उनमें डर पैदा करने की कोशिश करने लगा. पर एक सिपाही ने उसकी पीठ पर तड़ाक से एक लाठी जमा दी और एक भद्दी सी गाली भी दे डाली. कोई और समय होता तो कालू कें कें करता हुआ दुम दबा कर भाग जाता, लेकिन आज तो अम्मा की झोंपड़ी का सवाल था. एक दो बार कें कें करने के बाद वह और खूंखार हो उठा. इस बार दो सिपाहियों ने उसे घेर कर लाठियों से मार कर जमीन पर सदा के लिए लिटा दिया.


अम्मा रो रही थी, अपनी झोंपड़ी के लिए नहीं, कालू के लिए. अम्मा सिपाहियों को गालियाँ दे रही थी-"मुए, कालू को क्यों मार दिया, मारना ही था तो मुझे मार देते."

बुल डोज़र के चालक ने सर झुकाए हुए कहा-"अम्मा हम तो सिर्फ ड्यूटी कर रहे हैं, खुदा माफ़ करे."

वे कानून के बहुत बड़े जानकर थे. उन्होंने कहा-"कानून सेंटी नहीं होता है.”

एक और जानकर उनसे बहस करने के मूड में बोले-"फिर आप जनहित याचिकाओं के सम्बन्ध में क्या कहेंगे?"

कानूनविद महोदय ने कहा-"मुझसे बहस में मत उलझिए जनाब. अगर कुछ जानकारी चाहिए तो पहले फीस दीजिए."

और कुम्हलायी हुई गोरी चिट्टी मुनिया सड़क के किनारे ईंट जोड़ कर बनाये चूल्हे पर रोटियां सेंकने लगी थी. बूढी दादी और नन्हीं छोटी के लिए कम से कम रोटी नमक तो जुगाड़ना ही था. और जब विपदा आयी हो तो सेवक लोग भी सफ़ेद कुरता पजाम में पहुँच ही जाते हैं. सो पहुँच गए. मुनिया को सेवा देने के लिए कई हाथ लपके. मुनिया सेवकों के हाथों को पहचानती थी. वह जब से तेरह-चौदह की हुई थी वह सेवादारों को पहचानने लगी थी. वह जानती थी की मदद के हाथ मछली के जाल होते हैं.

सुगिया उधर अपने बच्चे को दूध पिला रही थी. बहुत से जनसेवक उसे देख रहे थे, माँ की तरह नहीं ! वे तौल रहे थे उस माँ को अपनी तराजू में. जनसेवा करते हुए कुछ जनसेवक राबड़ी का आनंद उठाना बहुत पसंद करते हैं.

रजिया अपनी किताब ले कर पढ़ रही थी, एक झोंपड़ी के मलवे पर. उसकी दसवीं की परीक्षा थी. वह धीरे से बुदबुदाई-"रात में, न जाने कहाँ, सोने का इंतजाम अब्बू करेंगे. रात की तो पढ़ाई गयी."

रजिया के अब्बू तभी कहीं से आये और अपनी बीवी से बोले-" टोनी तो एक कमरा किराए पर देने के लिए तैयार है, लेकिन क्या बताएं, उसके घर का इलाका शरीफों का नहीं है. "

"या अल्लाह!" इससे अधिक रजिया की अम्मा नहीं बोल पायी.

"खैर, मैं अब कल्लन के पास जाता हूँ..."

रजिया मन ही मन बोली-" या अल्लाह, मेरे ख्वाब का क्या होगा?"

तभी सरकारी माइक से आवाज गूंजने लगी-" जो भी लोग बेघर कर दिए गए हैं उनको अट्ठारह महीने के अन्दर फ़्लैट दिए जायेगे. फ़्लैट के बदले में हर उजाड़े गए परिवार को बीस हज़ार रूपए देने होंगे."

जनकुआ ने सिर पीटते हुए पूछा-" ज़फर भाई, जिंदगी में कभी इकठ्ठा बीस हजार रूपये तुमने देखा है."

"काहे सरकार की तरह मुझसे मजाक कर रहे हो. एक बात कहें, कहीं सर छिपानेकी जगह मिल जाये तो फिर से ठोंगा बनाने का काम शुरू कर दें. हमको लगा था कि सरकार ने प्लास्टिक के थैले पर रोक की घोषणा कर दी है, तो कागज के ठोंगे का मेरा काम फिर चल निकलेगा. लेकिन......"

गोगिया ने पूछा-" घर को क्यों तोडा दिया , माँ ?"

माँ ने बताया-" सौ बरस पहले तुम्हारे लकड़ दादा को कोयला खान के मालिक लाल साहब ने बलिया से यहाँ ला कर बसाया था. बाद में कोयला खान सरकारी हो गया और हमारी घर वाली जमीन भी सरकारी, और सरकारी जमीन पर किसी को रहने का अधिकार नहीं है."

वहीँ बगल में बैठा गोगिया का पिता अखबार पढ़ रहा था-" मंत्री जी के पास तीन तीन सरकारी आवास हैं और उनके चमचों ने भी अनेक सरकारी क्वार्टरों पर कब्ज़ा कर रखा है.....बड़े भवन, मल्टीप्लेक्स आदि न तोड़े जाएँ इसके लिए सरकार ने अध्यादेश लाया है......"





गुरुवार, 27 जनवरी 2011

लेखक की संगनी

        

       " पापा ने मेरे लिए कुछ भी तो नहीं किया. मेरी जिन्दगी ख़राब कर दी." संजय का यह वाक्य जब भी मेरे कानों में पड़ता तो मेरी आत्मा अंदर से रो पड़ती.लेकिन,मैं तो असहाय हो गया था. पहले गरीबी के सामने असहाय था और अब बेटे के सामने.
          शायद, कुछ लोगों के जीवन में हर परिस्थिति में असहाय बना रहना  ही लिखा होता है. और जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि सिर्फ बेटा ही क्यों,अनेक लोगों ने मेरे साथ वही किया जो आज बेटा कर रहा है.
           ऐसे अवसादपूर्ण समय में मैं बीते दिनों की ओर बार-बार  भागने लगता हूँ.....मेरे घर में बड़ी दीदी का राज चलता था.वह जो चाहती थीं और जो कहती थीं, वह कानून बन जाता था. उन्होंने फैसला सुना दिया," राजू को अब आगे पढ़ने लायक नहीं है. यह तो कालेज का गुंडा बन गया है.आगे चल के न जाने क्या क्या गुल खिलाएगा.."और मेरी पढ़ाई बीच में ही रुक गई.किस्मत से मेरी हिंदी अच्छी थी सो सोचा कि चलो कुछ लिख पढ़ कर ही कमाने का जुगाड़ बैठाया जाए. सभी जानते हैं कि  कलम  से लक्ष्मी का सम्बन्ध नहीं है,और मेरा भी लक्ष्मी से सम्बन्ध नहीं बन पाया. किन्तु कलम में   ये ताकत है कि वह किसी सेवक को मरने नहीं देती.मुझे भी मरने नहीं दिया.कलम चलती रही और घर-परिवार भी किसी तरह चलता रहा.
        स्वयं भूखे रह जाता लेकिन, अपने बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था कर देता था.मैं अपने बच्चों के जीवन के लिए, अपने जीवन को भी दांव  पर लगा देता.कई बार तो मरते-मरते बचा लेकिन, यह मेरे बेटे को कैसे पाता होगा?मैंने तो कभी इसका जिक्र भी किसी से नहीं किया.मैंने तो अपने संघर्ष की कथा-कहानी अपने हृदय में ही सहेज कर रखी.आंसुओं को कभी पलकों से ढलकने नहीं दिया.लेकिन अब मेरे आँसु जब चाहते हैं, पलकों से ढलक जाते हैं. 
        रात हो गई थी. जेब खाली और जिसके घर पर रुकने  का इरादा था, उसके घर में ताला लगा हुआ था.अब क्या करूँ ? कहाँ जाऊं? लेकिन कहीं तो रात गुजरने की व्यवस्था तो करनी होगी? स्टेशन की ओर निकल पड़ा. सोचा की वहीँ रात बिताऊंगा. सारे गरीबों को स्टेशन आश्रय देती है, मुझे भी दे देगी. स्टेशन के बाहरी बरामदे में लेट गया.भूखे पेट नींद नहीं आ रही थी. उसी समय एक सिपाही ने अपने पैर से ठोकर मारते हुए उठाया," यहाँ क्या कर रहा है? क्या नाम है? "यह कर उसने मुझे खीँच कर उठाया और एक झन्नाटेदार थप्पड़  मार दी. लगा की अब बेहोश हो जाऊँगा. मैं सिपाही को हक्का-बक्का देखता रह गया. सिपाही मुझको खींच कर थाना ले गया और फिर मैं एक मुजरिम की तरह जेल पहुँच गया.जेल में एक  कैदी को मुझ पर दया आ गयी.उसने मुझसे कहा," तुम मत घबराओ कल तुम्हारा बेल भी हो जाएगा और तुम पर लगा इल्जाम भी ख़त्म हो जाएगा.मैं तो जेल से ही बैठ कर हुकूमत चलता हूँ.पता नहीं क्यों आज मुझको एक नेक काम करने का मन  कर गया है! मैं अभी वकील को खबर करता हूँ."
        तभी राउंड पर जेलर आया. उसने आते ही उस कैदी को सलाम लगाया," क्या हुकुम है, दादा? "
        " चंडी, मैंने तो तुमको किसी दूसर काम से बुलाया था, लेकिन एक अर्जेंट काम निकल आया है. यह लड़का बेचारा शरीफ है. पता नहीं क्यों आज इस शरीफ को मैं यहाँ से बाहर निकलने का मन बनाया है. जरा उस दारोगा  को बुला देना, जिसने इसे जेल भेज दिया है. उसे डांट दूंगा. और हाँ, मेरे वकील को बुला दो, वह इसके बेल का इंतजाम करेगा. और जेलर तुमको कोई कष्ट हो तो कहो."
         " मंत्री जी तो आपके हुक्म पर चलते हैं,सर.बस एक छोटा सा  मेरा काम करवा दीजिए."
        " अरे क्या काम है  बोल तो सही."
        " आप जब तक यहाँ हैं तब तक तो मैं यहाँ रहना चाहता हूँ. लेकिन, उसके बाद मेरा तबादला रांची के केन्द्रीय कारागार  में करवा दीजिएगा."
        " ऐसे ही साफ़ साफ़ बोला करो..... जा, तेरा काम हो जाएगा." 
        " थैंक्यू  सर, प्रणाम सर....."
        मैं उस कैदी को समझ नहीं पाया. पर इतना तो जरूर समझ गया कि वह एक बड़ी चीज है, जिसके सामने जेलर क्या मंत्री भी बौने हैं.
        जल्दी ही मैं जेल से बाहर आया. जिस दारोगा  ने मुझको जेल भेजा था वह जेल  के दरवाजे पर मिला और मुझसे क्षमा मांगने लगा. उसने अपनी गाड़ी से मुझको स्टेशन तक ला कर पटना का टिकट भी ले कर दिया और हाथ में जबरन पांच सौ रुपए भी रखा दिए  और बोला," दादा से जरूर कह देना कि मैंने तुमसे माफ़ी मांग ली है." फिर उसने मेरे सामने हाथ जोड़ दिए.
        पटना पहुँच कर मैं  इस अख़बार के दफ्तर से उस दफ्तर में चक्कर लगाने लगा. कहीं कोई काम मिल जाए. फिर शाश्त्री जी मिले और उन्होंने मुझसे समसामयिक विषयों पर लीख  लिखवाना शुरू कर दिया.वे मुझको कभी अपने घर बुला कर खाना-वाना भी खिला दिया करते थे तो कभी कुछ रुपए मेरी जेब में डाल दिया करते थे. मैंने एक लौज में रहना शुरू कर दिया था. लौज़ के संचालक राजपाल जी  एक बीहड़ व्यक्ति थे.जब देखो गोली-बारूद की बात किया करते थे,लेकिन मेरे वे साथ बड़े रहम दिल थे.और उस दिन तो वे बहुत खुश हुए जब मैंने उनको बताया कि मुझे नवीन भारत में रिपोर्टर की नौकरी मिल गयी है.
       राजपाल जी ने मुझको लौज़ में सिंगल बेड  वाला कमरा दे दिया और मेरे रूम के दरवाज़े पर मेरे ओहदे के साथ नेम-प्लेट लगवा दिया.....एक रात जब मैं सोया था तो मुझको लगा कि मेरे  कमरे के दरवाजे के नीचे जो बड़ा सा छेद था, उससे कुछ सामान तेजी से मेरे कमरे में डाला जा रहा है. मैंने जल्दी से उठ कर बल्ब जलाया. मैं तो सन्न रह गया.....मेरे कमरे में दस-बारह पिस्तौल, गोलियां, हथगोले पहुँच चुके थे. मैं क्या करूँ इस पर विचार कर ही रहा था कि मुझे राजपाल जी की तेज आवाज सुनाई दी," दारोगा जी आपने तो पूरे लौज़ को सर्च कर ही लिया,लेकिन आपको कुछ भी नहीं मिला. और रही बात इस कमरे   कि तो यह कमरा नवीन भारत के रिपोर्टर का है. बिना सर्च वारंट के उनके कमरे की तलाशी लेंगे तो दूसर दिन अखबार में यह बात आ जाएगी.चलिए यह हजार रुपए रखिये और दारोगा  जी और निश्चिन्त हो जाएं   कि यहाँ हम लोग यहाँ  कोई हथियार रखते हैं या कोई दो नम्बर का धंधा करते है..." 
          मुझको सारी बात समझ में आ गई थी सो दूसर ही दिन मैंने उस लौज़ से विदा ले ली. फिर मैंने शादी करने की भूल कर बैठ, यह जानते हुए भी कि मैं कभी भी अपने बाल-बच्चों का भरण-पोषण सत्यवादी बन कर नहीं कर सकता. एक बच्चे  का बाप भी बन गया. उसकी जरूरतें  ही मेरी जरूरतें  बन गई थीं. किन्तु  उनकी जरूतों को पूरा करना आसान नहीं था.हाथ में जो वेतन का पैसा आता, वह कपूर की तरह गायब हो जाता. हर एक महीने का गुजरना, मैं  ईश्वर की कृपा मानता. सच्चाई  के साथ मैं पैसे कमाने का जितना भी प्रयास करता कोई लाभ नहीं मिलता. कुछ अतिरिक्त कमाने के लिए पत्रिकाओं में कहानियां लिखने लगा. आमदनी तो कुछ बढ़ी लेकिन खर्च तो उससे भी तेज  गति से बढ़ता  जाता. आमदनी और खर्च के बीच मैं  पेंडुलम बन कर रह गया था. उसी समय सच के शत्रुओं के कारण मुझे अखबार की सेवा से मुक्त कर दिया गया. हार अखबार में खबर फेल गई कि इस आधुनिक कबीर को सेवा में रखना अपने पैरों  पर कुल्हाड़ी  मारने के बराबर है.मैं फिर सड़क पर आ गया था. दो बच्चों का भविष्य की सोचना तो दूर की बात थी यहाँ तो पेट भरने का सवाल ही सुलझाना मुश्किल हो गया था. 
       मेरी कलम के सामने चुनौती थी, कुछ कर गुजरे की. मैंने कलम उठा ली और चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हो गया था. हर दूसर दिन एक कहानी मुझे लिखनी ही थी.
       हर सुबह  मैं सड़कों पर निकल पड़ता.अनजान लोगों से मिलता जुलता. उनके अंदर झांकता. आस पास के गाँव को पढ़ता. गाँव के लोगों को पढ़ता. रात मेरी कहानिया लिखते हुए गुजरते. मेरे जानने वाले लोग मुझे पागल कहते. शहर के सारे विवादित लोग मुझे विवादित कह कर पुकारते. मैं सभी विवादित व्यक्तियों का अकेला दुश्मन था. हर एक मेरा शिकार करना चाहता था. और पता नहीं ईश्वर ने मुझे किस माती से बनाया था कि मैं किसी का शिकार नहीं हो पाया. 
      वक्त बदला. मैंने फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाते हुए एक छोटा सा व्यवसाय शुरू किया. कलम और व्यवसाय की जोड़ी बन गई. माली हालत कुछ सुधरी. संजय को अच्छी शिक्षा देने की कोशिश की. लेकिन मैं उसे अच्छी शिक्षा नहीं दे पाया. शायद मैं उसमें शिक्षा के प्रति लगन ही नहीं जगा पाया. और फिर उसने मेरे सामने मुंह खोलना शुरू कर दिया. उबलना शुरू कर दिया.
      आज मैं संजय के साथ नहीं हूँ. बिल्कुल अकेला अपने बुढ़ापे से जूझ रहा हूँ. बेटे के साथ न होने का कोई गम नहीं है. मेरे साथ मेरी कलम है. इसी कलम के साथ मैं अपने सुख दुःख बाँट लेता हूँ. यही मेरी संगनी है. एक लेखक की संगनी.          
         

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

थानेदार साहब नहीं आए



कहानी 
            
       वह बहुत ही सहमी हुई थी...वह काँप रही थी...लगता था कि वह किसी खौफनाक हादसे से अभी-अभी गुजरी है...मैं सोचने लगा कि उस अनजान  लड़की से कैसे और क्या बात शुरू करूँ?मैं धीरे से उसके पास पहुंचा और पूछा."क्या हुआ ?...तुम तो बहुत घबराई हुई लग रही हो?....क्या मैं तुम्हारी कुछ मदत   कर सकता हूँ?"
         कांपती हुई आवाज में उसने कहा," अभी जो ट्रेन गुजरी है...."
        "हाँ,हाँ, अभी ट्रेन गुजरी है.....क्या हुआ?" 
        " मैं उस ट्रेन के आगे छलांग लगाने वाली थी....लेकिन..."
        " लेकिन क्या?"
        " लेकिन मुझसे पहले मैंने देखा कि....."
        " देखा कि?"
        " मुझसे पहले....मुझसे पहले  मेरी माँ  ने ट्रेन के आगे छलांग लगा दी....."
        " अब?"
        " अब मुझको वापस अपनी झोपड़पट्टी  जाना होगा....छोटा भाई किशोर  भूखा सो रहा होगा...."
       यह कह कर वह रो पड़ी थी....बेबसी की उस घटना ने मुझको भी दहला दिया....मैंने किसी तहर अपने आप को सम्हाला...तभी स्टेशन पर कुछ लोग चीखने-पुकार मचाने लगे...
         " मैंने उसको कहा," पहले अपनी माँ के बारे में सोचो कि क्या करना है...."
        " उसकी लाश को कल मुर्दाघर से ले लेंगे...लेकिन पहले तो मुझे  किशोर  को सम्हालना होगा....आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं?"
         " हाँ, लेकिन मुझको अपनी दिल्ली यात्रा स्थगित करनी होगी... खैर, चलो.. "
         " नहीं, आप दिल्ली जाएं मैं कुछ और उपाय कर  लूंगी..."
         " नहीं, मैं अब दिल्ली नहीं जाऊंगा....चलो तुम्हारे घर चलता हूँ...."
         " चलिए...."
         जो लड़की कुछ क्षण पहले तक इतनी घबराई हुई थी वह  अचानक इतनी संयत हो गई, यह देख कर मुझे आश्चर्य के साथ-साथ शंका भी हो रही थी कि कहीं दाल  में कुछ काला तो नहीं है....लेकिन एक पत्रकार होने के नाते मैंने  रिस्क ले लिया."
        रास्ते   में उसने मुझको अपना नाम ललिता बताया...उसने यह भी बताया कि गरीबी और जिल्लत के डर  से वह आत्महत्या करने जा रही थी...उसके पिता ने एक वर्ष पहले गरीबी से ही त्रस्त  हो कर आत्महत्या कर ली थी....वह महिला कालेज में बी.ए.की पढ़ाई  किसी तरह ट्यूशन आदि कर के कर रही थी.....
         जब उसकी झोंपड़ी के पास  पहुंचा तो देखा कि वहां भीड़ जमा है....भीड़ में से एक ने ललिता को देखते ही कहा,"कहाँ गई थी...तुमको मालूम है कि तुम्हारी माँ ने....."
         " मालूम है....आप लोग  कृपया मुझको अकेली छोड़ दें. आप अगर मदद में आगे आयेंगे तो मुझे फिर लूटने के लिए ही आगे आएंगे.आप लोग मुझे किसी होटल में पहुंचा देंगे.अब तो कम से कम मुझ पर रहम कीजीए." 
         झोपड़पट्टी के सारे लोग ललिता को गालियां देते हुए अपनी-अपनी खोली में चले गए.
          उसने मुझसे कहा," आपने मेरी दुनिया देख ली.....आपको लग रहा होगा कि मैं पागल हूँ या फिर मेरी दुनिया कितनी पतित है...सर, आपकी जो भी दुनिया होगी वह भी ऎसी ही  होगी.जिस्म की प्यासी...." और वह रो पड़ी....
            कुछ संयत होते हुए उसने मुझको कहा," क्या आप मुझको कुछ रूपए दे सकते हैं....कल माँ की लाश लाने में भी बहुत खर्च होगा....नगरनिगम का क्लर्क भी लाश जलाने के लिए कम से कम पांच सौ घूस में मांगेगा....जब बापू ने आत्महत्या की थी तब भी लाश जलाई  पांच सौ देने पड़े थे....अभी पुलिस भी आ कर तंग करेगी सो अलग..."
             मैंने उसे पर्स से तीन हजार रूपए दे दिए.
            " मै आपके सारे रुपए धीरे-धीरे कर के लौटा दूँगी...." यह कर कर ललिता झापडी के अंदर तेजी से गई और कागज कलम ले कर वापस आई और मेरा पाता और मोबाईल नम्बर नोट कर लिया...तभी पुलिस की जीप आ कर रुकी. जीप से हवालदार उतरा और उसने पूछा," अरे तुम ही ललिता हो जिसकी माँ साली मेरे थाना क्षेत्र में आत्महत्या कर ली....चलो पांच सौ निकालो ताकि बड़ा साहब तुमको रिपोर्ट दे सकें और तुम कल मुर्दा घर से अपनी माँ की लाश ले सको....और हाँ, थाना चलने के लिए भी तैयार हो हो....पिछले सल जब तुम्हारा बाप मारा था तो तुम्हारी माँ रात भर थाने में रही थी....अरे,अरे ये चिकना साला  तेरे बगल में कौन खड़ा है?"
             " चिकना साला विजय जी हैं जो जनमत अखबार के रिपोर्टर हैं.....और कुछ कहना-पूछना है क्या?"
            हवालदार रिपोर्टर शब्द सुनते ही सीधे जीप में बैठे बड़ा साहब के पास गया और उससे कुछ बात की और फिर ललिता के पास लौटा और एक रिपोर्ट उसके हाथ में डाल कर चलता बना...पुलिस की जीप वसूली अभियान को अधूरा छोड़ कर चली गई तो ललिता ने मुझ से कहा," सर, मैं आपके सारे पैसे लौटा दूँगी, चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े....अब तो भाई के लिए नरक भोगने के लिए तैयार होना ही होगा.....    
           मैंने उससे विदा लेते हुए कहा,"पैसे लौटाने की जरूरत नहीं है. "
            " ऐसी बात मत कीजिए, सर....आप मुझसे नाराज हो गए क्या...मैंने पुलिसिया अंदाज में आपको गाली जो दे दी,लेकिन पुलिस यही भाषा जानती है, क्या करूं....अगर आप न आते तो मुझे  रात भर थाने में रहना  पड़ता...जब मेरे बापू मरे थे तो मेरी माँ  को रात भर थाने में रहना पड़ा था, पति की मौत का टैक्स चुकाने!"
           मैं ललितासे विदा ले कर सीधे अपने अख़बार के दफ्तर पहुंचा. वहां मैंने ललिता  की कहानी लिखी और दूसरी सुबह वह कहानी अखबार के मुख्य पृष्ठ छपी.सभी दलों के नेताओं को एक मुद्दा मिल गया. ललिता की झोपड़पट्टी के सामने टीवी पत्रकारों की कतार लग गई. नेता लोग आते और कुछ न कुछ ललिता के हाथमें रख जाते।वैसे नेता भी पहुंचे जो सेवक तो जरूर कहलाते  हैं लेकिन, किसी से सेवा लेने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते.  किन्तु  थानेदार साहब नहीं आए क्योंकि उनको एसपी साहब ने सस्पेंड कर दिया था.